पुरुषार्थ

रहर   जीवनमा   कति   आउँछ।
तर    विचार    लुकेर   डराउँछ॥
मन अहो कति दिव्य विशाल छ।
तन अहो कति दिव्य विशाल छ॥

सुमन   डुब्छ  यहाँ  अपवर्गमा।
सुमन  पुग्छ  अहो कित सर्गमा॥
किन  भुलेछ  सबै  पुरुषार्थ  हे।
विनय  भाव  कता  छ  पात्र हे॥

सहनशील   भएर   म  आउँदा।
विगतको  अब  गीत म गाउँदा॥
वदन  साउनले  कति भिज्दछ।
कि पिर पत्थरले कित किच्दछ॥

खुद  उठेर यहाँ  कित उठ्नु छ।
कित सदा  न उठीकन सुत्नु छ॥
सफल  होइन  जीवन  कर्म  हो।
गर   परिश्रम  हे  जुन  धर्म  हो॥

किरण सुन्दर स्वच्छ उषा थियो।
सहज  जीवन  हे किन बिग्रियो॥
समय  जीवनमा  कति  आउँछ।
वदन  बाँच्न  यहाँ कति  पाउँछ॥

छन्द - द्रुतविलम्बित 
रचना - प्रकाशमणि खनाल 



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